Advay Dikshit

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Tuesday, December 31, 2013

अद्वय
मैं अद्वय हूँ
पूंछने दो सवाल दर सवाल
लम्हा लम्हा मुट्ठी में हो
यह बाबा ही बताएंगे
तन से ही नहीं
मन से भी सुन्दर बनाएंगे
जीना सीखना है
दरिंदों से लड़ना है
चाटुकारों की मंडी में
चन्दन सम रहना है
लोग क्या कहेंगे
इससे न डरना है
आत्मविश्वास से परिपूर्ण
भविष्य संवारना है
कमज़ोर नींव नहीं
मज़बूत बनना है
इसलिए पूंछने दो
सवाल दर सवाल
क्योंकि मैं अद्वय हूँ

Born on 29 November 2012
फ़लक के तारों को देख
जागती थी तमन्ना
कोई एक सितारा
मेरे आँगन में भी उतरे

उतर आया है पूरा चाँद
मेरी बगिया में
और रोशन हो गयी है
मेरी बाड़ी उसकी चांदनी से

चमक गया है हर पल जैसे
मेरे धूमिल पड़े जीवन का
मिल गया है मकसद जैसे
मुझे अपनी ज़िंदगी का .

मेरी ज़िंदगी की धुरी का वो
केन्द्र बन गया है
मेरे घर एक नन्हा सा
फरिश्ता आ गया है ....