Advay Dikshit
Monday, January 6, 2014
मन भीगा रहता है मेरा
प्रेम की गंगा यमुना सा
कभी तुम कृष्ण बन जाते,
कभी राम, या सोन चिरैया !
तेरी मुस्कान है अजोड
जग में नहीं, इसका तोड़
दूध, मिठाई, ,नए नए पकवान
फल, मीठे और रसीले,
अब मै किसे खिलाऊं ,
चाव भरी, अपने हाथों से मैं
अब मीठी नींद किसे सुलाऊं
अब कौन बाल पकडे ...कौन अब मुहं मुँह नोचे
किसे बुलाऊं प्यारा रमैया ....सोन चिरैया .Really I miss U
प्रेम की गंगा यमुना सा
कभी तुम कृष्ण बन जाते,
कभी राम, या सोन चिरैया !
तेरी मुस्कान है अजोड
जग में नहीं, इसका तोड़
दूध, मिठाई, ,नए नए पकवान
फल, मीठे और रसीले,
अब मै किसे खिलाऊं ,
चाव भरी, अपने हाथों से मैं
अब मीठी नींद किसे सुलाऊं
अब कौन बाल पकडे ...कौन अब मुहं मुँह नोचे
किसे बुलाऊं प्यारा रमैया ....सोन चिरैया .Really I miss U
30 november 2013 ..बहुत दिनों पर देखा तुमको मेरे प्यारे बेटे ,
दौड़ दौड़ कर तुम चलते हो ,अब ना रहते लेटे |
पैंया पैंया दौड़ लगाते ,कितना अच्छा लगता,
छोटा सा मेरा अद्वय बेटा, भागा भागा चलता |
सात समुन्दर पार है बेटा ,जन्म दिवस जब आया,
देख के तुमको कम्प्यूटर पर अपना मन बहलाया |
मन कहता जल्दी से मिलकर तुमको खूब खिलाऊँ,
सारी दुनिया की खुशियों को तुम पर आज लुटाऊँ |
18 november 2013 ....आज मेरे पौत्र अद्वय का हिंदी तिथि अनुसार जन्म दिन है . उसके लिए कुछ उद्गार -
जन्मदिन आए बारंबार तारों से चमको जग में, तुम्हे मिले स्नेह अपार |
सफलता पाँव पखारे सदा, साथ हो स्वास्थ्य और संपदा, करे कृपा करतार जन्मदिन आए बारंबार ||
खुशियों से भरी झोली हो, फिर भी कोयल सी बोली हो, झरे वसंत बहार जन्मदिन आए बारंबार |
अपनों के संग सब मेले हों, सच सपने सब अलबेले हों, किस्मत करे श्रृंगार जन्मदिन आए बारंबार ||
जन्मदिन आए बारंबार तारों से चमको जग में, तुम्हे मिले स्नेह अपार |
सफलता पाँव पखारे सदा, साथ हो स्वास्थ्य और संपदा, करे कृपा करतार जन्मदिन आए बारंबार ||
खुशियों से भरी झोली हो, फिर भी कोयल सी बोली हो, झरे वसंत बहार जन्मदिन आए बारंबार |
अपनों के संग सब मेले हों, सच सपने सब अलबेले हों, किस्मत करे श्रृंगार जन्मदिन आए बारंबार ||
कार चली भई कार चली,
अद्वय जी की कार चली |
जगह नहीं अन्दर मिल पाई,
बैठे कार के ऊपर |
रेस सभी से कर सकते हैं ,
सबके आगे जाकर||
गाना सुनते ,हवा हैं खाते
जल्दी जल्दी भागे जाते|
मिला सड़क पर ट्रैफिक वाला,
अद्वय का उससे पड़ा पाला |
अद्वय ने आई कार्ड दिखाया,
पुलिस मैन ने पूंछ दबाया|
पूंछ दबा कर मार सलामी,
भगा सिपाही गिरा पजामी ||
अद्वय जी की कार चली |
जगह नहीं अन्दर मिल पाई,
बैठे कार के ऊपर |
रेस सभी से कर सकते हैं ,
सबके आगे जाकर||
गाना सुनते ,हवा हैं खाते
जल्दी जल्दी भागे जाते|
मिला सड़क पर ट्रैफिक वाला,
अद्वय का उससे पड़ा पाला |
अद्वय ने आई कार्ड दिखाया,
पुलिस मैन ने पूंछ दबाया|
पूंछ दबा कर मार सलामी,
भगा सिपाही गिरा पजामी ||
आते नहीं कबूतर हैं अब ,जब होता है भोर |
चला गया है दूर मेरा एक लाल ,मेरा चित चोर.||
बाल हो गए बड़े हमारे ,नहीं खींचता कोई|
विदा तुम्हे करके सबकी आँखे हैं कितनी रोई ||
खुश तुम रहना मेरे बेटे ,खूब उछलना खूब कूदना |
जल्दी जल्दी भागे भागे पूरे घर में दौड़ लगाना ||
हंसना और हंसाना सबको मेरे प्यारे भैया|
सुन कर हँसी तुम्हारी ,खुश होजाए सारी दुनिया ||
हनुमान जी साथ हैं तेरे ,तुझको खूब बढायेंगे|
विश्व जीत कर तुम आओगे ,हम ये रोज मनाएंगे ||
चला गया है दूर मेरा एक लाल ,मेरा चित चोर.||
बाल हो गए बड़े हमारे ,नहीं खींचता कोई|
विदा तुम्हे करके सबकी आँखे हैं कितनी रोई ||
खुश तुम रहना मेरे बेटे ,खूब उछलना खूब कूदना |
जल्दी जल्दी भागे भागे पूरे घर में दौड़ लगाना ||
हंसना और हंसाना सबको मेरे प्यारे भैया|
सुन कर हँसी तुम्हारी ,खुश होजाए सारी दुनिया ||
हनुमान जी साथ हैं तेरे ,तुझको खूब बढायेंगे|
विश्व जीत कर तुम आओगे ,हम ये रोज मनाएंगे ||
Sunday, January 5, 2014
रिश्तों में एक रिश्ता
दादा और पोते का रिश्ता
ये बड़ा ही खास होता है ।
ये रिश्ता क्या होता है,
ये तो केवल एक एहसास होता है।
ये रिश्ता केवल इस लिए नेक होता है,
क्यों की बुढ़ापा और बचपन दोनों ही एक होता है।
पोते के साथ दादा ऐसा लगता है
जैसे एक छोटे से पौधे के
ऊपर आसमान का दोशाला है ।
दादा और पोते के रिश्तों के बिना
रिश्तों की अधूरी वर्णमाला है।
पोता कंधे पर चढ़ कर बोलता है
कि दादा मैं तो आप से भी बड़ा हो गया।
और दादा कहता है कि इन कंधों पर घूम के बेटा बड़े हो जाओगे ,
तभी तो मेरी अर्थी को एक दिन कांधा लगाओगे ।
दादा और पोते का रिश्ता
ये बड़ा ही खास होता है ।
ये रिश्ता क्या होता है,
ये तो केवल एक एहसास होता है।
ये रिश्ता केवल इस लिए नेक होता है,
क्यों की बुढ़ापा और बचपन दोनों ही एक होता है।
पोते के साथ दादा ऐसा लगता है
जैसे एक छोटे से पौधे के
ऊपर आसमान का दोशाला है ।
दादा और पोते के रिश्तों के बिना
रिश्तों की अधूरी वर्णमाला है।
पोता कंधे पर चढ़ कर बोलता है
कि दादा मैं तो आप से भी बड़ा हो गया।
और दादा कहता है कि इन कंधों पर घूम के बेटा बड़े हो जाओगे ,
तभी तो मेरी अर्थी को एक दिन कांधा लगाओगे ।
निज भाषा उन्नति अहै, सब उन्नति को मूल
बिन निज भाषा-ज्ञान के, मिटत न हिय को सूल ।
अंग्रेजी पढ़ि के जदपि, सब गुन होत प्रवीन
पै निज भाषा-ज्ञान बिन, रहत हीन के हीन ।
उन्नति पूरी है तबहिं जब घर उन्नति होय
निज शरीर उन्नति किये, रहत मूढ़ सब कोय ।
निज भाषा उन्नति बिना, कबहुं न ह्यैहैं सोय
लाख उपाय अनेक यों भले करे किन कोय ।
इक भाषा इक जीव इक मति सब घर के लोग
तबै बनत है सबन सों, मिटत मूढ़ता सोग ।
और एक अति लाभ यह, या में प्रगट लखात
निज भाषा में कीजिए, जो विद्या की बात ।
तेहि सुनि पावै लाभ सब, बात सुनै जो कोय
यह गुन भाषा और महं, कबहूं नाहीं होय ।
विविध कला शिक्षा अमित, ज्ञान अनेक प्रकार
सब देसन से लै करहू, भाषा माहि प्रचार ।
भारत में सब भिन्न अति, ताहीं सों उत्पात
विविध देस मतहू विविध, भाषा विविध लखात ।
सब मिल तासों छांड़ि कै, दूजे और उपाय
उन्नति भाषा की करहु, अहो भ्रातगन आय ।
बिन निज भाषा-ज्ञान के, मिटत न हिय को सूल ।
अंग्रेजी पढ़ि के जदपि, सब गुन होत प्रवीन
पै निज भाषा-ज्ञान बिन, रहत हीन के हीन ।
उन्नति पूरी है तबहिं जब घर उन्नति होय
निज शरीर उन्नति किये, रहत मूढ़ सब कोय ।
निज भाषा उन्नति बिना, कबहुं न ह्यैहैं सोय
लाख उपाय अनेक यों भले करे किन कोय ।
इक भाषा इक जीव इक मति सब घर के लोग
तबै बनत है सबन सों, मिटत मूढ़ता सोग ।
और एक अति लाभ यह, या में प्रगट लखात
निज भाषा में कीजिए, जो विद्या की बात ।
तेहि सुनि पावै लाभ सब, बात सुनै जो कोय
यह गुन भाषा और महं, कबहूं नाहीं होय ।
विविध कला शिक्षा अमित, ज्ञान अनेक प्रकार
सब देसन से लै करहू, भाषा माहि प्रचार ।
भारत में सब भिन्न अति, ताहीं सों उत्पात
विविध देस मतहू विविध, भाषा विविध लखात ।
सब मिल तासों छांड़ि कै, दूजे और उपाय
उन्नति भाषा की करहु, अहो भ्रातगन आय ।
मन भीगा रहता है मेरा
प्रेम की गंगा यमुना सा
कभी तुम कृष्ण बन जाते,
कभी राम, या सोन चिरैया !
तेरी मुस्कान है अजोड
जग में नहीं, इसका तोड़
दूध, मिठाई, ,नए नए पकवान
फल, मीठे और रसीले,
जो तुम्हें खिलाती हूँ, मैं,
चाव भरी, अपने हाथों से मैं
जब् मीठी नींद सुलाती हूँ,
कभी बाल पकडे ...कभी मुँह नोचे
फिर सो जाता है मेरा प्यारा रमैया ....सोन चिरैया ..
प्रेम की गंगा यमुना सा
कभी तुम कृष्ण बन जाते,
कभी राम, या सोन चिरैया !
तेरी मुस्कान है अजोड
जग में नहीं, इसका तोड़
दूध, मिठाई, ,नए नए पकवान
फल, मीठे और रसीले,
जो तुम्हें खिलाती हूँ, मैं,
चाव भरी, अपने हाथों से मैं
जब् मीठी नींद सुलाती हूँ,
कभी बाल पकडे ...कभी मुँह नोचे
फिर सो जाता है मेरा प्यारा रमैया ....सोन चिरैया ..
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