Advay Dikshit

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Tuesday, December 31, 2013

अद्वय
मैं अद्वय हूँ
पूंछने दो सवाल दर सवाल
लम्हा लम्हा मुट्ठी में हो
यह बाबा ही बताएंगे
तन से ही नहीं
मन से भी सुन्दर बनाएंगे
जीना सीखना है
दरिंदों से लड़ना है
चाटुकारों की मंडी में
चन्दन सम रहना है
लोग क्या कहेंगे
इससे न डरना है
आत्मविश्वास से परिपूर्ण
भविष्य संवारना है
कमज़ोर नींव नहीं
मज़बूत बनना है
इसलिए पूंछने दो
सवाल दर सवाल
क्योंकि मैं अद्वय हूँ

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