रिश्तों में एक रिश्ता
दादा और पोते का रिश्ता
ये बड़ा ही खास होता है ।
ये रिश्ता क्या होता है,
ये तो केवल एक एहसास होता है।
ये रिश्ता केवल इस लिए नेक होता है,
क्यों की बुढ़ापा और बचपन दोनों ही एक होता है।
पोते के साथ दादा ऐसा लगता है
जैसे एक छोटे से पौधे के
ऊपर आसमान का दोशाला है ।
दादा और पोते के रिश्तों के बिना
रिश्तों की अधूरी वर्णमाला है।
पोता कंधे पर चढ़ कर बोलता है
कि दादा मैं तो आप से भी बड़ा हो गया।
और दादा कहता है कि इन कंधों पर घूम के बेटा बड़े हो जाओगे ,
तभी तो मेरी अर्थी को एक दिन कांधा लगाओगे ।
दादा और पोते का रिश्ता
ये बड़ा ही खास होता है ।
ये रिश्ता क्या होता है,
ये तो केवल एक एहसास होता है।
ये रिश्ता केवल इस लिए नेक होता है,
क्यों की बुढ़ापा और बचपन दोनों ही एक होता है।
पोते के साथ दादा ऐसा लगता है
जैसे एक छोटे से पौधे के
ऊपर आसमान का दोशाला है ।
दादा और पोते के रिश्तों के बिना
रिश्तों की अधूरी वर्णमाला है।
पोता कंधे पर चढ़ कर बोलता है
कि दादा मैं तो आप से भी बड़ा हो गया।
और दादा कहता है कि इन कंधों पर घूम के बेटा बड़े हो जाओगे ,
तभी तो मेरी अर्थी को एक दिन कांधा लगाओगे ।

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