Advay Dikshit

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Sunday, January 5, 2014

मन भीगा रहता है मेरा
प्रेम की गंगा यमुना सा
कभी तुम कृष्ण बन जाते,
कभी राम, या सोन चिरैया !
तेरी मुस्कान है अजोड
जग में नहीं, इसका तोड़
दूध, मिठाई, ,नए नए पकवान
फल, मीठे और रसीले,
जो तुम्हें खिलाती हूँ, मैं,
चाव भरी, अपने हाथों से मैं
जब् मीठी नींद सुलाती हूँ,
कभी बाल पकडे ...कभी मुँह नोचे
फिर सो जाता है मेरा प्यारा रमैया ....सोन चिरैया ..

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